छत से ₹22,000 महीना: जानिए कैसे!

क्या आपके घर की छत खाली पड़ी है? छत्तीसगढ़ के अभनपुर के एक युवा किसान ने अपनी छत के छोटे से हिस्से को ₹22,000 प्रति महीना देने वाले बिजनेस में बदल दिया है। जानिए कैसे वे मात्र 12×10 के कमरे में ‘Rooftop Quail Farming’ (बटेर पालन) के साथ बत्तख और मुर्गी पालकर बिना किसी अतिरिक्त खर्च के बंपर मुनाफा कमा रहे हैं। इस लेख में पढ़ें चूजे की लागत से लेकर तैयार माल की बिक्री और मुनाफे का पूरा गणित!

WhatsApp Image 2026-06-24 at 8.02.03 PM

आज के दौर में जब रोजगार के पारंपरिक साधन सीमित हो रहे हैं, तब कम जगह और कम लागत में शुरू होने वाले घरेलू व्यवसाय युवाओं के लिए उम्मीद की एक नई किरण लेकर आए हैं। छत्तीसगढ़ के रायपुर जिले के अभनपुर (ग्राम बख्तरा) में रहने वाले नंद किशोर ध्रुव ने कुछ ऐसा ही अनोखा कर दिखाया है। उन्होंने अपने घर की खाली पड़ी छत का सही इस्तेमाल करके एक ऐसा इंटीग्रेटेड फार्मिंग मॉडल तैयार किया है, जिससे वे हर महीने ₹22,000 की शानदार अतिरिक्त कमाई (Side Income) कर रहे हैं।

यदि आपके पास भी घर में थोड़ी सी खाली जगह या छत है, तो यह लेख आपके लिए एक बेहतरीन बिजनेस गाइड साबित हो सकता है।

1. कैसे हुई शुरुआत? (The Inspiration)

नंद किशोर ध्रुव बताते हैं कि वे पिछले 5-6 सालों से यूट्यूब पर खेती-किसानी और पशुपालन से जुड़े वीडियो देख रहे थे। वीडियो से प्रेरणा लेकर उन्होंने करीब दो साल पहले ‘ध्रुव बटेर फार्म’ की शुरुआत की। उन्होंने मात्र 200 बटेर के चूजों से अपना काम शुरू किया था और आज उनका यह छोटा सा प्रयास एक मुनाफेदार बिजनेस में बदल चुका है।

2. छत पर एक साथ 4 तरह का पालन (Integrated Model)

नंद किशोर ने अपनी छत और उसके आस-पास के कमरों का ऐसा सेटअप तैयार किया है जहाँ वे एक साथ चार अलग-अलग चीजें पाल रहे हैं:

  • बटेर (Quail): यह उनके फार्म का मुख्य हिस्सा है।

  • बत्तख (Duck): वे खाकी कैंपबेल वैरायटी के बत्तख पाल रहे हैं, जिन्हें ज्यादा पानी की जरूरत नहीं होती।

  • सोनाली मुर्गी (Sonali Chicken): देसी मुर्गी की इस नस्ल को वे मांस और अंडों के लिए पालते हैं।

  • गिनी पिग (Guinea Pig): इसकी शुरुआत उन्होंने हाल ही में 1 यूनिट (3 नर और 7 मादा) से की है।

3. बटेर पालन का पूरा गणित (Cost & Profit Analysis)

बटेर पालन इस पूरे मॉडल का सबसे मुख्य और सबसे ज्यादा कमाई देने वाला हिस्सा है। नंद किशोर इसका पूरा गणित इस तरह समझाते हैं:

  • उत्पादन और समय चक्र: वे हर महीने 4 यूनिट में कुल 1600 बटेर पालते हैं। एक बैच (400 बटेर) को पूरी तरह तैयार होने में केवल 30 से 35 दिन का समय लगता है। ठंड के दिनों में तो यह मात्र 25 दिनों में ही बिकने के लिए तैयार हो जाते हैं।

  • लागत (Cost): बटेर का एक चूजा ₹10 में मिलता है। 35 दिनों में इसके दाने-पानी पर करीब ₹18 का खर्च आता है। यानी एक बटेर को बेचने लायक बनाने में कुल खर्च ₹28 आता है।

  • बिक्री और मुनाफा (Selling Price): तैयार बटेर को थोक (Wholesale) में ₹45 और खुदरा (Retail) में ₹60 प्रति नग के हिसाब से बेचा जाता है।

  • कुल शुद्ध लाभ: 400 बटेर के एक बैच पर करीब ₹12,000 का खर्च आता है और इस पर ₹6,000 का शुद्ध मुनाफा होता है। इस तरह 4 बैच (1600 बटेर) से वे हर महीने ₹22,000 से अधिक की शुद्ध बचत कर लेते हैं।

4. शून्य इंफ्रास्ट्रक्चर लागत (Zero Setup Cost)

इस फार्मिंग की सबसे बड़ी खासियत यह है कि नंद किशोर ने इसे शुरू करने के लिए कोई नया शेड या महंगी बिल्डिंग नहीं बनाई।

  • उन्होंने घर की छत पर बने 12×10 के पुराने और खाली कमरों का उपयोग किया।

  • बत्तखों के लिए शेड बनाने में उन्होंने घर में पड़ी पुरानी बल्ली और कबाड़ की सीटों का इस्तेमाल किया।

  • गिनी पिग रखने के लिए उन्होंने बिना सीमेंट-गारे के सिर्फ पुरानी ईंटों को जोड़कर एक छोटा सा घेरा बना दिया।

  • फर्श पर बिछाने के लिए वे धान के पैरा (पुआल) का उपयोग करते हैं, जिससे लागत बिल्कुल शून्य हो जाती है।

5. बटेर की फीडिंग और देखरेख

बटेर को पालना बेहद आसान है क्योंकि इनमें बीमारियां बहुत कम होती हैं और इन्हें किसी भी तरह के वैक्सीन (टीकाकरण) की जरूरत नहीं पड़ती।

  • दाना (Feed): पहले दिन से 10वें दिन तक इन्हें ‘प्री-स्टार्टर’ दाना दिया जाता है, और 10 दिन के बाद ‘स्टार्टर’ फीड दिया जाता है।

  • पानी: गर्मियों के दिनों में सुबह, दोपहर और शाम (तीन बार) ताजा पानी दिया जाता है।

6. मार्केट और सप्लाई चेन (Marketing)

शुरुआत में नंद किशोर को थोड़ी दिक्कत हुई, जिसके लिए वे स्थानीय साप्ताहिक बाजारों में खुद जाकर फुटकर बेचते थे। लेकिन धीरे-धीरे जब लोगों को उनके फार्म के बारे में पता चला, तो स्थानीय ढाबा मालिकों और मीट काउंटर्स से उनका संपर्क हो गया। आज स्थिति यह है कि बाजार में मांग इतनी ज्यादा है कि वे आपूर्ति (Supply) भी पूरी नहीं कर पा रहे हैं। उनके क्षेत्र में करीब 200 ढाबे और 300 से अधिक काउंटर्स हैं जहाँ बटेर की भारी डिमांड रहती है।

निष्कर्ष: युवाओं के लिए एक मिसाल

नंद किशोर ध्रुव केवल फार्मिंग नहीं करते, बल्कि दोपहर 3 बजे के बाद वे बाजार में मोमोज और अन्य खाद्य पदार्थों का स्टॉल भी लगाते हैं। दिन के बचे हुए समय में वे अपनी छत पर इस बिजनेस को संभालते हैं।

उनका यह मॉडल साबित करता है कि अगर इच्छाशक्ति हो, तो बिना किसी बड़े निवेश या सरकारी लोन के भी, घर की छत से एक बेहतरीन स्वरोजगार शुरू किया जा सकता है। यह बिजनेस उन लोगों के लिए बिल्कुल सही है जो कम जोखिम और कम समय में अपनी कमाई शुरू करना चाहते हैं।

(सफल फार्मिंग का यह पूरा वीडियो आप यूट्यूब चैनल Omprakash Ausar पर देख सकते हैं।)

यहाँ इस लेख से जुड़े कुछ महत्वपूर्ण FAQs (अक्सर पूछे जाने वाले सवाल) दिए गए हैं, जो पाठकों के मन में उठने वाले मुख्य संशयों को दूर करेंगे:

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)

Q1. क्या छत पर बटेर पालन (Rooftop Quail Farming) करने के लिए बहुत बड़ी जगह की जरूरत होती है?

उत्तर: बिल्कुल नहीं। वीडियो में किसान नंद किशोर जी मात्र 12×10 के एक छोटे से कमरे में 400 से 800 बटेर आसानी से पाल रहे हैं। अगर आपके पास छत पर एक छोटा सा कमरा या खाली हिस्सा है, तो आप वहां से शुरुआत कर सकते हैं।

Q2. बटेर का चूजा कितने में मिलता है और इसे तैयार होने में कितना समय लगता है?

उत्तर: बटेर का एक चूजा (Chicks) लगभग ₹10 में मिल जाता है। इसे पूरी तरह बेचने लायक (तैयार) होने में मात्र 30 से 35 दिन का समय लगता है। सर्दियों के मौसम में तो यह 25 दिनों में ही तैयार हो जाता है।

Q3. एक बटेर को पालने में कुल कितना खर्च आता है और मुनाफा कितना होता है?

उत्तर: एक बटेर पर चूजे की कीमत और 35 दिनों के दाने-पानी का खर्च मिलाकर कुल लागत लगभग ₹28 आती है। इसे थोक में ₹45 और फुटकर में ₹60 तक बेचा जाता है, जिससे प्रति पक्षी ₹17 से ₹32 तक का शुद्ध मुनाफा होता है।

Q4. क्या बटेर में बीमारियां होने का खतरा ज्यादा रहता है? क्या इन्हें वैक्सीन देनी पड़ती है?

उत्तर: नहीं, बटेर की रोग प्रतिरोधक क्षमता (Immunity) मुर्गियों की तुलना में बहुत बेहतर होती है। इनमें बीमारियां होने का खतरा बेहद कम होता है और इनके 35 दिनों के जीवन चक्र में किसी भी प्रकार के वैक्सीन (टीकाकरण) की आवश्यकता नहीं पड़ती।

Q5. बत्तख और गिनी पिग पालने के लिए क्या बहुत पानी या महंगे सेटअप की जरूरत है?

उत्तर: नहीं। इस मॉडल में ‘खाकी कैंपबेल’ नस्ल के बत्तख पाले गए हैं, जिन्हें तैरने के लिए बड़े तालाब या ज्यादा पानी की जरूरत नहीं होती। वहीं, गिनी पिग को रखने के लिए सिर्फ सूखी घास (पैरा/पुआल) और बिना सीमेंट की ईंटों का घेरा बनाया गया है, जो बहुत ही कम खर्च में तैयार हो जाता है।

 Q6. तैयार होने के बाद बटेर को कहाँ बेचा जा सकता है?

उत्तर: बटेर के मांस की मांग स्थानीय ढाबों, रेस्टोरेंट और चिकन काउंटर्स (मीट शॉप्स) पर बहुत ज्यादा होती है। शुरुआत में आप स्थानीय साप्ताहिक बाजारों में इसे फुटकर बेच सकते हैं, और नेटवर्क बनने के बाद सीधे ढाबों या होलसेलर्स को सप्लाई कर सकते हैं।