पैराकुट्टी से बकरी पालन: कम लागत में तगड़ा मुनाफा
“क्या आप जानते हैं कि मात्र ₹10 के दैनिक खर्च में आप अपने बकरे का वजन 85 किलो तक बढ़ा सकते हैं? छत्तीसगढ़ के सारंगढ़ के एक सफल किसान से सीखें पैराकुट्टी से बकरी पालन करने का वह अनोखा और वैज्ञानिक देसी तरीका, जिसने कम लागत में पशुपालन की दुनिया में क्रांति ला दी है।”

बकरी : कम लागत में तगड़ा मुनाफा
आज के समय में जहाँ पशु आहार की कीमतें आसमान छू रही हैं, वहीं छत्तीसगढ़ के सारंगढ़ जिले के एक युवा किसान रितेश नायक ने एक ऐसी मिसाल पेश की है, जिसने बकरी पालन के पारंपरिक तरीकों को बदल दिया है। पैराकुट्टी से बकरी पालन करने का उनका यह देसी और वैज्ञानिक तरीका न केवल बकरों का वजन तेजी से बढ़ाता है, बल्कि लागत को भी न के बराबर कर देता है।
पैराकुट्टी से बकरी पालन: क्या है यह अनोखा छत्तीसगढ़ी फॉर्मूला?
अक्सर किसान इस बात से परेशान रहते हैं कि बकरों को क्या खिलाएं जिससे वे जल्दी मोटे हों। रितेश नायक अपने फार्म में धान के पुवाल (पैरा) का उपयोग करते हैं। पैराकुट्टी से बकरी पालन की शुरुआत तब होती है जब धान के सूखे पुवाल को मशीन से बेहद बारीक काट लिया जाता है। रितेश बताते हैं कि पुवाल जितना बारीक और सॉफ्ट होगा, बकरियां उसे उतनी ही आसानी से पचा पाएंगी और चाव से खाएंगी।
पोषण का पावरहाउस: पैराकुट्टी के साथ क्या मिलाएं?
सिर्फ सूखा पुवाल खिलाने से बकरे मोटे नहीं होते। पैराकुट्टी से बकरी पालन को सफल बनाने के लिए रितेश इसमें एक विशेष मिश्रण मिलाते हैं:
पका हुआ अनाज: चावल के छोटे टुकड़े (कनकी) और मक्के को पानी में उबालकर ‘भात’ की तरह पकाया जाता है। पका हुआ अनाज देने से बकरों का पाचन तंत्र दुरुस्त रहता है और पोषक तत्व सीधे शरीर को लगते हैं।
कैटल फीड का मिश्रण: बाजार में मिलने वाले उच्च गुणवत्ता वाले पशु आहार (Cattle Feed) को इस मिश्रण में मिलाया जाता है, जिसमें खली और आवश्यक मिनरल्स होते हैं।
लेयरिंग तकनीक: ड्रम में पहले पैराकुट्टी, फिर पका हुआ अनाज और फिर फीड डालकर अच्छी तरह मिक्स किया जाता है। यह मिश्रण बकरों के लिए किसी “शाही दावत” से कम नहीं होता।
स्टॉल फीडिंग और पैराकुट्टी से बकरी पालन के फायदे
रितेश अपने 50 से अधिक बकरों को चराने बाहर नहीं ले जाते। उनका मानना है कि पैराकुट्टी से बकरी पालन और ‘स्टॉल फीडिंग’ (एक जगह बांधकर खिलाना) सबसे बेहतर है। इसके पीछे दो मुख्य कारण हैं:
ऊर्जा की बचत: चराने ले जाने पर बकरे कई किलोमीटर चलते हैं जिससे उनकी कैलोरी बर्न होती है। घर पर रहकर वे सिर्फ खाते हैं और आराम करते हैं, जिससे वजन तेजी से बढ़ता है।
बीमारियों से सुरक्षा: बाहर चराने से बकरियों में कृमि (Worms) और इन्फेक्शन का खतरा रहता है, जो नियंत्रित वातावरण में कम हो जाता है।
लागत मात्र ₹10: पैराकुट्टी से बकरी पालन की आर्थिक गणित
सबसे चौंकाने वाली बात इस तकनीक की लागत है। रितेश के अनुसार, पैराकुट्टी से बकरी पालन करने पर एक बकरे का दैनिक खर्च मात्र 10 रुपये आता है। चूंकि धान का पुवाल उनके खुद के खेत का होता है, इसलिए मुख्य खर्च केवल अनाज और बिजली का होता है।
कमाई का हिसाब:
पिछले साल उन्होंने महज 10-12 बकरे बेचकर 4 लाख रुपये का मुनाफा कमाया।
उनके फार्म के बकरे (सिरोही और बीटल क्रॉस) 85 किलो तक के वजन के हो जाते हैं।
सिर्फ 23 साल की उम्र में वे अपनी कॉलेज की पढ़ाई के साथ इस मुनाफे वाले बिजनेस को सफलतापूर्वक चला रहे हैं।
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